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तीस साल बाद पद स्वीकृत न होने के आधार पर टीचर का वेतन रोकना सही नहींं : हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकाेर्ट्

-नियुक्ति को पद स्वीकृत न होने के आधार पर वापस नहीं लिया जा सकता

प्रयागराज, 18 मार्च (Udaipur Kiran) । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा कि 30 साल पहले सृजित पद पर हुई अनुमोदित नियुक्ति को पद स्वीकृत न होने के आधार पर वापस नहीं लिया जा सकता। ऐसे पद पर कार्यरत व्यक्ति को 30 साल तक लगातार काम करने के बाद वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा पद किसने सृजित किया, वह सक्षम था या नहीं, इससे याची का कोई सरोकार नहीं है। इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है। 30 साल निर्विवाद रूप से वेतन लेने व पढ़ाने के बाद यह कहना कि सरकार से पद ही स्वीकृत नहीं था, अनुचित है।

कोर्ट ने 28 मार्च 24 के आदेश को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया और याची को सेवा जनित परिलाभों का हकदार माना है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने मदरसा के सहायक अध्यापक शफीक अहमद की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

मऊ जिले के अलीनगर में जामिया आलिया अरबिया, सोसायटी द्वारा गैर सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक मदरसा जामिया आलिया अरबिया अलीनगर का संचालन व प्रबंधन किया जा रहा है। शिक्षण एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के कुल 27 पद स्वीकृत हैं तथा नियुक्त अध्यापकों व कर्मचारियों को वेतन दिया जा रहा है। विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि के कारण शिक्षण कर्मचारियों के लिए और अधिक पद स्वीकृत करने का अनुरोध किया गया। मामले की जांच के बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मऊ ने 14 पदों के सृजन की संस्तुति की तथा निदेशक उर्दू/पश्चिमी भाषा, उ.प्र लखनऊ को आवश्यक कार्रवाई हेतु संस्तुति प्रेषित की।

याची 1988 से सहायक अध्यापक तहतानिया (प्राथमिक) के पद पर कार्यरत है। वर्ष 1995 से पदों की स्वीकृति के बाद उसे राजकीय कोष से वेतन मिलना शुरू हो गया। वर्ष 2021 में सहायक अध्यापक फौकानिया (माध्यमिक) का पद रिक्त होने पर पदोन्नति की प्रक्रिया शुरू की गई। तत्पश्चात याची को उक्त पद पर पदोन्नत कर दिया गया। पदोन्नति के कागजात जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी, मऊ को भेजे गए, जिन्होंने वित्तीय स्वीकृति के लिए उन्हें रजिस्ट्रार- निरीक्षक, उ.प्र. मदरसा शिक्षा बोर्ड, लखनऊ को भेज दिया। वित्तीय स्वीकृति के बाद भी उन्हें वेतन नहीं दिया गया। कहा गया कि राज्य सरकार की अनुमति के बिना निदेशक, उर्दू ने पद की स्वीकृति की अनुमति दी। ऐसे में याची की सहायक अध्यापक तहतानिया के पद पर पूर्व में की गई नियुक्ति स्वीकृत पद पर नहीं थी। इसलिए वेतन जारी करने के आदेश को वापस लिया जाता है। इस आदेश को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याची ने कहा 1996 में शासनादेश जारी कर पद की स्वीकृति दी गई थी। याची के खिलाफ उसकी नियुक्ति रद्द करने के लिए धोखाधड़ी या कदाचार का कोई आरोप नहीं लगाया गया। 1995 से फरवरी 2024 तक राज्य के खजाने से उसे वेतन दिया जा रहा था।

कोर्ट ने कहा कि पिछले 30 वर्षों से इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि याची को गैर स्वीकृत पद का वेतन दिया गया। अधिकारी इस बात से पूरी तरह संतुष्ट थे कि याची की नियुक्ति स्वीकृत पद पर है। इसलिए उसे लगातार वेतन मिल रहा था। अब 30 साल बाद पद स्वीकृत नहीं होने के आधार पर वेतन रोकना सही नहीं है।

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(Udaipur Kiran) / रामानंद पांडे

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