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हाईकोर्ट ने वीरेंद्र मनराल हत्याकांड के आरोपित दर्शन सिंह को किया दोषमुक्त

नैनीताल हाईकोर्ट।

नैनीताल, 26 मार्च (Udaipur Kiran) । हाईकोर्ट ने रामनगर कोर्ट के बाहर वर्ष 2018 में हुए वीरेंद्र मनराल हत्याकांड के आरोपित दर्शन सिंह को निचली अदालत द्वारा दी गई आजीवन कारावास की सजा से दोषमुक्त कर दिया है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 15 जून 2023 को पारित निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए दर्शन सिंह की अपील स्वीकार कर ली।दर्शन सिंह को आईपीसी की धारा 120-बी और 302 के तहत दोषी ठहराते हुए निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों में विरोधाभास, अभियोजन पक्ष की कमजोरियों और पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव को देखते हुए उसे बरी करने का आदेश दिया।

मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अुसार मामला वर्ष 2018 का था। जब रामनगर कोर्ट के बाहर दिन दहाड़े वीरेंद्र मनराल की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शिकायतकर्ता दीवान सिंह ने अपनी प्राथमिकी में चार आरोपिताें देवेंद्र सिंह उर्फ बाऊ, सोनू कांडपाल, हरीश फर्तियाल और संजय नेगी के नाम दर्ज कराए थे। पुलिस जांच में दर्शन सिंह और गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी का नाम भी सामने आया था और उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। अभियोजन पक्ष ने इस मामले में 19 गवाह पेश किए, जिन्होंने दर्शन सिंह को घटना में शामिल बताया, जबकि बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उसका नाम बाद में जोड़ा गया और उसकी संलिप्तता को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं। अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पुष्पा जोशी ने दलील दी कि दर्शन सिंह को प्राथमिकी में नामजद नहीं किया गया था और बाद में गवाहों के बयानों के आधार पर आरोप पत्र में शामिल किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत मोबाइल नंबर, जिसके आधार पर उसे घटनास्थल के पास बताया गया, वास्तव में उसके नाम पर पंजीकृत नहीं था, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति, धर्मेंद्र के नाम पर था। इसके बावजूद पुलिस ने धर्मेंद्र से पूछताछ नहीं की और न ही उसे गवाह के रूप में पेश किया।

उच्च न्यायालय ने यह भी पाया कि ट्रायल कोर्ट में अभियुक्त की नाबालिग होने की दलील को नजरअंदाज कर दिया गया था। न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड से आयु प्रमाण रिपोर्ट मंगवाई जिसमें पुष्टि हुई कि घटना के समय दर्शन सिंह 17 वर्ष 3 माह और 13 दिन का था। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर यह स्पष्ट है कि किसी भी चरण में किशोर होने का दावा किया जा सकता है और यदि अभियुक्त नाबालिग पाया जाता है तो उस पर किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधान लागू होंगे। इन तथ्यों और साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि दर्शन सिंह हत्या की साजिश में शामिल था। गवाहों के बयानों में विरोधाभास थे और मोबाइल लोकेशन संबंधी सबूत अविश्वसनीय पाए गए। अदालत ने सेशन कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए दर्शन सिंह को दोषमुक्त कर दिया और जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

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(Udaipur Kiran) / लता

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