
नई दिल्ली, 26 अगस्त (Udaipur Kiran) । दक्षिण एशिया का पारंपरिक खेल खो-खो अब अमेरिका महाद्वीप की खेल संस्कृति में अपनी नई पहचान बना रहा है। अमेरिका, अर्जेंटीना, ब्राज़ील और पेरू जैसे देशों में यह खेल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। कभी केवल सांस्कृतिक जिज्ञासा समझा जाने वाला खो-खो आज शिक्षकों, प्रवासी समुदायों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के सहारे एक संगठित खेल आंदोलन में बदल चुका है।
खो-खो वर्ल्ड कप-2024 इस बदलाव का अहम पड़ाव रहा, जब चारों देशों की टीमें पहली बार भारत में उतरीं। यह भागीदारी प्रतीकात्मक से कहीं अधिक थी। कोचों और खिलाड़ियों ने लौटकर अपने-अपने देशों में ठोस विकास रणनीतियां तैयार कीं। अमेरिका खो-खो फेडरेशन ने कैलिफ़ोर्निया, न्यू जर्सी और जॉर्जिया में टीमें बनाकर प्रवासी समुदायों और स्कूलों तक इस खेल को पहुंचाया। अर्जेंटीना में 1999 से प्रोफेसर रिकार्डो अकुना खो-खो को बढ़ावा दे रहे हैं। आज यह खेल 24 प्रांतों में पहुंच चुका है और जल्द ही राष्ट्रीय लीग शुरू होने वाली है। ब्राज़ील में 20 से अधिक स्कूलों में इसे शारीरिक शिक्षा कक्षाओं का हिस्सा बनाया गया है और 450 से अधिक प्रशिक्षक तैयार हो चुके हैं। वहीं पेरू में जागरूकता अभियान और कोच प्रशिक्षण शुरुआती स्तर पर हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसकी संभावना सबसे अधिक है।
खो-खो की सरलता और तेज़ी इसका सबसे बड़ा आकर्षण है। बिना ज्यादा उपकरण के यह छोटे मैदान में खेला जा सकता है, जिससे बच्चों को फुर्ती, रणनीति और टीमवर्क सिखाने का अवसर मिलता है। अमेरिका में वीकेंड कैंप और सामुदायिक टूर्नामेंट इसके लिए राष्ट्रीय प्रतिभा ढांचे की नींव रख रहे हैं। साथ ही समर्पित कोर्ट और पोल्स की कमी, सीमित फंडिंग और स्थानीय भाषाओं में प्रशिक्षण सामग्री अभाव की चुनौतियां भी सामने हैं। अमेरिकी संघ और अन्य देश इंटरनेशनल खो-खो फेडरेशन तथा भारतीय संघ के सहयोग से इन कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि रणनीतिक सहयोग और प्रायोजन मिला, तो खो-खो राष्ट्रमंडल खेलों और भविष्य में ओलंपिक तक अपनी जगह बना सकता है। कैलिफ़ोर्निया के जिम से लेकर साओ पाउलो के स्कूलों और पटागोनिया के मैदानों तक खो-खो अब सिर्फ भारत का खेल नहीं रहा। यह अमेरिका महाद्वीप का उभरता हुआ सामुदायिक और प्रतिस्पर्धी खेल है, जो वैश्विक खेल भविष्य की ओर बढ़ रहा है।
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(Udaipur Kiran) दुबे
