

—एक दिन पूर्व ही श्रद्धालु स्नान के लिए कतारबद्ध होने लगे,स्कंद पुराण के काशी खंड के 32वें अध्याय में स्नान पर्व का उल्लेख
वाराणसी,29 अगस्त (Udaipur Kiran) । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में लोलार्क छठ पर्व पर शुक्रवार को लाखों नि:संतान दंपतियों ने संतान की चाह में कड़ी सुरक्षा के बीच भदैनी स्थित प्राचीन संकरे लोलार्क कुण्ड में एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आस्था की तीन डुबकी लगाई। कुंड में डुबकी लगाने के बाद आस्थावानों ने अपने गीले वस्त्र और आभूषण कुंड में ही परम्परानुसार छोड़ दिए। इसके बाद नुकीली सुईयों से बिंधे हुए फल भगवान सूर्य को चढ़ा सन्तान प्राप्ति के लिए उनसे गुहार लगाई।
पर्व की पूर्व संध्या गुरूवार दोपहर से ही कुण्ड में स्नान के लिए हजारों दम्पति लगभग दो किलोमीटर लम्बी लाइन में बैठकर स्नान के लिए अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे। धूप,उमस और गर्मी के बीच आस्था इस कदर हिलोरे मार रही थी कि कतार सोनारपुरा तक पहुंच गई। स्नान पर्व पर फल, फूल, पूजन सामग्री, भतुआ, श्रीफल, कदंब के फल साथ ही बनावटी पायल, बिछिया, नाक की कील और नथुनी जैसे जेवरों की सजी अस्थायी दुकानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी रही। मेला क्षेत्र से जुड़ने वाली सड़कों पर जिला प्रशासन ने यातायात प्रतिबंधित किया है।
-क्रीं कुण्ड में भी लगा आस्था का मेला
लोलार्क षष्ठी पर्व पर ही रविन्द्रपुरी स्थित अघोराचार्य बाबा कीनाराम की तप स्थली क्रीं कुण्ड में भी नि:संतान दम्पतियों ने सन्तान प्राप्ति के लिए डुबकी लगाई। यहां मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखण्ड से भी श्रद्धालु स्नान के लिए एक दिन पहले ही आ गये थे। चंदौली के चहनिया की प्रभा सिंह,शकुंतला सिंह,कंचन दुबे,चकिया चंदौली की आभा सिंह,उषा पांडेय परिजनों के साथ क्रीं कुंड में आस्था की डुबकी लगा कर प्रफुल्लित दिखी। शकुन्तला सिंह और उनकी मां शांति सिंह ने बताया कि बाबा कीनाराम की कृपा से संतान की प्राप्ति होने पर यहा स्नान के लिए आई। पिछले तीन सालों से वे हर वर्ष लोलार्क छठ पर क्रीं कुंड में स्नान के लिए पूरे आस्था से आती हैं। स्नान के बाद दर्शन पूजन कर घर लौटती हैं।
पौराणिक मान्यता और ऐतिहासिक महत्व
बताते चले कि स्कंद पुराण के काशी खंड के 32वें अध्याय में उल्लेख है कि माता पार्वती ने स्वयं इस कुंड परिसर में स्थित मंदिर में शिवलिंग की पूजा की थी। एक अन्य कथा है कि विद्युन्माली दैत्य शिव का भक्त था। भगवान सूर्य ने इस राक्षस को परास्त किया। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव हाथ में त्रिशूल लेकर सूर्य की ओर दौड़े। दौड़ते समय भगवान सूर्य इसी स्थान पर पृथ्वी पर गिरे। इससे इस स्थान का नाम लोलार्क पड़ा। इस कुण्ड का जीर्णोद्धार महारानी अहिल्या बाई होलकर, अमृत राव और कूंच बिहार स्टेट के महाराज ने करवाया था। लोलार्क कुंड का वर्णन गहरवाल के ताम्रपत्रों, महाभारत, स्कंदपुराण के काशी खंड में, शिव रहस्य, सूर्य पुराण और काशी दर्शन में विस्तार से किया गया है। उधर, लोलार्क षष्ठी पर्व में उमड़ने वाली भीड़ को लेकर कमिश्नरेट पुलिस सर्तक है।
—————
(Udaipur Kiran) / श्रीधर त्रिपाठी
