
तीन दिवसीय सांस्कृतिक जन-जागरूकता कार्यक्रम में नुक्कड़ संवाद, नाटकीय मंचन
वाराणसी, 30 नवंबर (Udaipur Kiran) । उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को जन-जन तक पहुँचाने के लिए आयोजित होने वाले काशी–तमिल संगमम 4.0 के अंतर्गत रविवार को नमोघाट पर संवाद और संस्कृति का संगम दिखा।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्वावधान में चल रहे तीन दिवसीय सांस्कृतिक जन-जागरूकता पहल “वणक्कम काशी” के दूसरे दिन नमोघाट पर नुक्कड़ संवाद, नाटकीय मंचन, अभिव्यक्तिपूर्ण संवादों ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। गंगा के तट पर आयोजित इस कार्यक्रम ने उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक संगम को अपनी संवादात्मक शैली के माध्यम से देखने–समझने का एक विशिष्ट अवसर भी दिया।
कला प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया गया कि काशी और तमिल संस्कृति असंख्य ऐतिहासिक, धार्मिक और भाषाई सूत्रों से जुड़ी हुई हैं। भगवान शिव की आराधना, वेद–आगम परंपराएँ, शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक रीतियाँ दोनों प्रदेशों को अनादिकाल से ही एक आध्यात्मिक धारा में बांधती आई हैं। संवादों में विशेष रूप से इस बात पर बल दिया गया कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसे विश्व में विशिष्ट पहचान प्रदान करती है। कार्यक्रम के दौरान शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित “तमिल सीखें – तमिल करकलम” पहल को भी रोचक और सरल शैली में प्रस्तुत किया गया।
दर्शकों को तमिल और हिंदी की साझा ध्वनियों, मूल शब्दों और अभिव्यक्तियों से परिचित कराया गया, जिससे भाषा सीखने की जिज्ञासा और उत्साह बढ़ा। युवाओं और स्थानीय पर्यटकों ने इस पहल में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हुए सांस्कृतिक संवाद का जीवंत अनुभव प्राप्त किया। आयोजन की संरचना और संचालन में मुख्य समन्वयक डॉ. स्वप्ना मीना और सह-समन्वयक डॉ. अरुण कुमार ने बड़ी भूमिका निभाई। वहीं, स्वयंसेवक टीम की सदस्य रिया दुबे और जे. ए. मोल्लाह ने पूरे जोश के साथ नाट्य प्रस्तुतियों और संवाद कार्यक्रमों में भाग लिया।
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(Udaipur Kiran) / श्रीधर त्रिपाठी