
पुण्यतिथि पर याद किए गए शंकराचार्य निरंजन देव, आयोजित हुआ पांच दिवसीय अनुष्ठान
मथुरा, 29 अगस्त (Udaipur Kiran) । गोवर्धन स्थित श्री आद्य शंकराचार्य आश्रम में गोवर्धन पुरी पीठ के ब्रह्मलीन 144वें शंकराचार्य स्वामी निरंजन देवतीर्थ की पुण्यतिथि पर पांच दिवसीय भव्य अनुष्ठान का आयोजन हुआ। इस दौरान उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। कार्यक्रम 23 अगस्त से प्रारंभ होकर 27 अगस्त तक चला। प्रथम दिन असम के मुख्यमंत्री हिमंता विश्वशर्मा की धर्मपत्नी एवं प्राइड ईस्ट इंटरटेनमेंट की प्रबंध निदेशक रिनिकी भुइंया उपस्थित रहीं। वहीं समापन में अरुणाचल के गृह मंत्री मामा नातुंग उपस्थित रहे।
इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में वरिष्ठ भाजपा नेता एवं पूर्व सांसद सत्यदेव पचौरी, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अजीत सिंह, समाजसेवी किशोर जयंत माधव, डिब्रूगढ़ के डिप्टी मेयर उज्जवल फुकन, मुनीन्द्रत पटवारी गुवाहाटी, डोगरा समाज ट्रस्ट की संरक्षक निधी डोगरा सहित देशभर से आए श्रद्धालुओं ने परमाचार्य को श्रद्धांजलि अर्पित की।कार्यक्रम में भारी संख्या में साधु-संत, विद्वतगण एवं दण्डी स्वामी भी शामिल रहे। स्वामी निरंजन देवतीर्थ भाद्रपद शुक्लपक्ष प्रतिपदा के दिन वर्ष 1996 में ब्रम्हलीन हुए थे। आश्रम के आचार्यों ने इस दौरान लिंगतोभद्र, नवग्रह, दशदिग्पाल आदि स्थापित कर देवमंडल का पूजन, भगवान चंद्रमौलेश्वर का अभिषेक पूजन एवं राजराजेश्वरी का विशेषार्चन संपन्न कराया। इस अवसर पर गोवर्धन पुरी पीठ के वर्तमान शंकराचार्य स्वामी अधोक्षजानंद देवतीर्थ ने स्वामी निरंजन देवतीर्थ को भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का सशक्त प्रचारक और उपदेशक बताया। उन्होंने कहा कि सनातन संन्यास परंपरा को जीवंत बनाने में स्वामी निरंजन देवतीर्थ का योगदान अतुलनीय है। शंकराचार्य ने कहा कि स्वामी निरंजन देवतीर्थ के संदेश का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जायेगा। जगद्गुरु अधोक्षजानंद देवतीर्थ ने कहा कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी निरंजन देवतीर्थ ने भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर गाय, गंगा और गीता के संरक्षण और संवर्धन को लेकर आजीवन संघर्ष किया। गौहत्या के खिलाफ 1966-67 में तत्कालीन केंद्र सरकार के विरुद्ध उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली में 72 दिन का अनशन भी किया था। ‘हिन्दू कोड बिल’ के विरुद्ध भी उन्होंने आंदोलन किया था। इसके चलते उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
उन्होंने कहा कि स्वामी निरंजन देवतीर्थ ने गौ हत्या के विरोध में शंकराचार्य के रूप में प्राप्त छत्र, दण्ड तथा सिंहासन का भी परित्याग कर दिया था, जो उनके ऋषि सदृश अद्वितीय स्वाभिमान तथा निर्भीकता के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। शंकराचार्य ने कहा कि स्वामी निरंजन देवतीर्थ के संघर्ष का ही नतीजा है कि वर्तमान केंद्र और राज्य की सरकारें गौ माता के संरक्षण को लेकर आज सजग हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब सनातन परंपराओं के साथ अखंड भारत का सपना साकार होगा।
(Udaipur Kiran) / महेश कुमार
