
नई दिल्ली, 26 अगस्त (Udaipur Kiran) । उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की ओर से राष्ट्रपति और राज्यपालों के समक्ष विधेयकों को प्रस्तुत करने पर संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत संवैधानिक विकल्पों पर भेजे गए रेफरेंस पर आज चौथे दिन की सुनवाई पूरी कर ली। संविधान बेंच इस मामले पर अगली सुनवाई 28 अगस्त को करेगा।
सुनवाई के दौरान आज उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि अगर कोई राज्यपाल 2020 के विधेयक को 2025 में भी सहमति नहीं देता है, तो क्या कोर्ट तब भी शक्तिहीन की तरह देखता रहेगा। तब मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील नीरज किशन कौल ने कहा कि ऐसी स्थिति में इसे संसद पर फैसला करने के लिए छोड़ देना चाहिए। कौल ने कहा कि ऐसी बहस की शुरुआत इससे नहीं की जा सकती है कि राष्ट्रपति और राज्यपाल विवेकाधिकार का दुरुपयोग करेंगे।
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने कहा कि संविधान के निर्माताओं ने व्यवस्था बनाई थी कि किसी राज्य विधानसभा से पारित विधेयक को केंद्र सरकार रोक सकती है, लेकिन वो विवेकाधिकार का मामला है। संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत विधेयक को अस्वीकार करने पर कोई समय सीमा नहीं है। तब चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या केंद्र सरकार को राज्य सूची के विधेयक को भी रोकने का अधिकार है। तब साल्वे ने कहा कि हां। तब चीफ जस्टिस ने बीआर अंबेडकर के भाषण का जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि आपात स्थिति को छोड़कर केंद्र सरकार अपनी परिधि में ही काम करेगी। सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि अगर राज्यपाल के पास इतनी शक्ति है तो वो धन विधेयक को भी रोक सकते हैं। तब साल्वे ने कहा की हां राज्यपाल ऐसा कर सकते हैं। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ये सवाल नहीं उठेगा क्योंकि धन विधेयक अनुच्छेद 207 के तहत आता है।
पहले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्यपाल अनिश्चितकाल तक विधेयक को लंबित रखते हैं तो विधायिका मृतप्राय हो जाएगी। कोर्ट ने पूछा था कि तब क्या ऐसी स्थिति में भी कोर्ट शक्तिहीन है। इस पर केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि न्यायपालिका किसी विकट स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल को ऐसा दिशानिर्देश जारी नहीं कर सकता जिसका नजीर के रुप में इस्तेमाल हो। मेहता ने कहा था कि इसका राजनीतिक समाधान है। ऐसी परिस्थितियों में लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया ही समाधान है। मेहता ने कहा था कि ऐसा समझना गलत है कि सभी संवैधानिक संस्थाएं असफल हो जाएं और केवल कोर्ट ही बचा हो। मेहता ने कहा था कि कोर्ट संविधान का अभिरक्षक है लेकिन कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान कोर्ट नहीं कर सकता है।
संविधान बेंच ने 22 जुलाई को केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। संविधान बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस चंदुरकर और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं। बता दें कि राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत उच्चतम न्यायालय से इस मसले पर 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। राष्ट्रपति को किसी भी कानूनी या संवैधानिक मसले पर उच्चतम न्यायालय की सलाह लेने का अधिकार है।
(Udaipur Kiran) /संजय———–
(Udaipur Kiran) / सुनीत निगम
