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पर्यावरण संरक्षण के मुददों को अपने घोषणा पत्र में शामिल करें सियासी दल : गुमान सिंह

मंडी, 26 मई (Udaipur Kiran) । हिमालय नीति अभियान के राष्ट्रीय संयोजक गुमान सिंह ने कहा कि सामाजिक आंदोलनों, पर्यावरण संगठनों की ओर से लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए जनघोषणा पत्र जारी किया है। जिसे अपने-अपने घोषणापत्र में शामिल करने का सभी राजनैतिक दलों से आग्रह भी किया गया है। यहां पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह बड़े खेद का विषय है कि मानवीय सभ्यता और जीवन के लिए जरूरी पर्यावरणीय मुददों को किसी भी राजनैतिक दल ने अपने घोषणा पत्र में शामिल नहीं किया है। उन्होंने कहा कि हमारा मकसद जन सहभागिता के साथ पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास, स मान जनक रोजगार तथा यहां की भौगोलिक भुगर्भीय पारिस्थितिकी को ध्यान में रख कर हिमाचल के विकास की नीति अपनाई जाए। सभी तरह के ढांचागत निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर भौगोलिक व भूगर्भीय अध्यन के अनुरूप नीति बनाई जाए, प्रदेश की भौगोलिक परिस्थिति को देखते हुए सभी बड़े निर्माण कार्यों व परियोजनाओं पर रोक लगाई जाए।

उन्होंने कहा कि जन घोषणापत्र में घरों तथा भवनों का निर्माण सुरक्षित स्थानों पर सुनिश्चित करने तथा ऊंची बहु मंजिला इमारतों व विनाशकारी ढांचागत निर्माण पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की गई है। जल संरक्षण तथा लोक मित्र मिश्रित वनों के उपार्जन के लिए जन सहभागिता आधारित नीति बनाने,प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्यागों पर पूर्ण रोक लगाने,प्लास्टिक व कचरा प्रबंधन पर ठोस नीति अपनाने की मांग की गई है। इसके अलावा कृषि, वन उपज व बागवानी उपज पर आधारित प्रशोधन की लघु औद्योगिक इकाइयों को प्रोत्साहित करना तथा लघु हरित औद्योगिकरण की नीति पर उद्योग विकसित किए जाएं। लघु, विकेंद्रियकृत जि मेवार पर्यटन नीति अपनाई जाए तथा बड़े होटल निर्माण पर पूर्ण रोक लगाइ जाए। पर्यटन का सारा बोझ मनाली और शिमला पर है। जबकि सारा हिमाचल प्राकृतिक रूप से सुंदर है, यहां पर ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए। उन्होंने कहा कि सरकारी व प्राइवेट कंपनियों द्वारा बिछाई गई बिजली की ट्रांसमिशन लाइनों के नीचे खतरे में आने वाली प्रभावित भूमि, रिहायशी घरों, मवेशी खानों का कानूनन अधिग्रहण किया जाना चाहिए और प्रभावितों को उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए। इसके लिए केंद्र सरकार को बिजली ट्रांसमिशन के लिए नया कानून लाने की जरूरत है ।

हिमालयी क्षेत्रों के लिए बने राष्ट्रीय विकास नीति

उन्होंने कहा कि हिमालयी पर्यावरण संरक्षण, टिकाऊ विकास व राष्ट्रीय हित में को ध्यान में रख कर जन-सहभागिता से हिमालयी विकास नीति बनाई जाए। पहाड़ के परंपरागत निवासियों व जैव विविधता का संरक्षण हो और गैर हिमालय आबादियों को यहां न बसाया जाए। जबकि पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिय स मान जनक रोजगार के साधन मुहैया करवाए जाएं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ सालों में पर्यावरणीय कानूनों में बड़े पैमाने पर बड़े बदलाव किए और उनको कार्पोरेट बड़े पूंजीपतियों के हित में मोड़ा गया । जिससे एनवायरमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट के प्रावधानों को कमजोर किया गया है तथा जनसुनवाई व लोगों की सहभागिता को नजरअंदाज किया जा रहा है। देश के सीमा क्षत्रों में बड़ी परियोजनाओं को 100 किलोमीटर तक वन संरक्षण अधिनियम में छूट दी गई। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण के कानूनों को स त किरने, वन अधिकार कानून को उसकी मूलभावना के अनुरूप लागू किया जाए और उसमें छेड़छाड़ की जो कोशिश हुई हैं उनको वापस लिया जाना चाहिए। इस अवसर पर स्थानीय पर्यावरणविद नरेंद्र सैनी भी मौजूद रहे।

(Udaipur Kiran) /मुरारी/उज्जवल

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