Madhya Pradesh

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक है ‘स्व’ की स्थापना : सीताक्का

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक है ‘स्व’ की स्थापना : सीताक्का
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक है ‘स्व’ की स्थापना : सीताक्का
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक है ‘स्व’ की स्थापना : सीताक्का

– पुनरुत्थान विद्यापीठ के प्रकल्प ज्ञान सागर के 1051 ग्रंथों का लोकार्पण

भोपाल, 10 मार्च (Udaipur Kiran) । भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ‘स्व’ की स्थापना करने की आवश्यकता है। हम जो भी विषय पढ़ते हैं, वे भारतीय ज्ञान परंपरा और जीवनमूल्यों के अनुरूप नहीं है। इसी कारण आज की पीढ़ी में एक बहुत बड़ा वर्ग दिग्भ्रमित दिखाई देता है। व्यवस्था परिवर्तन का अगला कार्य स्व आधारित तंत्र निर्मित करना है। उस दिशा में हमने कुछ कदम बढ़ाए हैं। पुनरुत्थान विद्यापीठ का ज्ञान सागर प्रकल्प भी ऐसा ही एक प्रयास है।

यह विचार राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख कार्यवाहिका सीताक्का ने रविवार को पुनरुत्थान विद्यापीठ के ज्ञान सागर प्रकल्प के 1051 ग्रंथों के लोकार्पण समारोह में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन भोपाल के प्रज्ञा दीप संस्थान में हुआ। समारोह की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र के संघचालक अशोक सोहनी ने की।

सीताक्का ने कहा ने वेदों की रक्षा के लिए भगवान ने पहला अवतार लिया। यानी ग्रंथों की रक्षा करना दैवीय कार्य है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में इन संदर्भ ग्रंथों का उपयोग करने की हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने पुस्तक की तुलना भगवान के भोग से करते हुए कहा कि हम अपने ईष्ट को छप्पन भोग लगाते हैं। बाद में भोग को प्रसाद के रूप में लोगों को बांटा जाता है। इसी तरह, जब हम पुस्तक पढ़ते हैं तो उसका ज्ञान तत्व हमारे भीतर जाता है, पुस्तक वहीं रहती है। पुस्तक से प्राप्त विचार एवं ज्ञान को समाज में पहुंचना यह हमारी जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि तीर्थ यात्रा पर सब लोग नहीं जा पाते हैं, ऐसे में हम तीर्थ से लौटे हुए लोगों के दर्शन करके तीर्थ यात्रा का पुण्य प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार, सब तो ग्रंथ लिख नहीं सकते। इसलिए लोकार्पण में हुई अनुभूति को समाज के बीच लेकर जाना हमारी जिम्मेदारी है। ज्ञान सागर के इन ग्रंथों को भी समाज में पहुंचने के प्रयास करेंगे। उन्होंने कहा कि सामूहिक चिंतन की प्रक्रिया से तैयार ग्रंथों का बहुत महत्व है।

भारतीय ज्ञान परंपरा से निकला व्यक्ति सार्थक सिनेमा रचता है, इस बात को समझाते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान फिल्म के निर्माता ने बताया कि मैंने विद्या भारती के स्कूल में पढ़ते हुए रामायण और भारतीय ग्रंथों का अध्ययन किया, इसलिए हनुमान जैसी फिल्म के निर्माण का विचार आया। सीताक्का ने बताया कि आक्रांताओं ने तलवार के बल पर बहुत कुछ नष्ट किया, देश को लूटा लेकिन हमारी परंपरा ने ज्ञान सागर के बिंदुओं को बचाकर रखा। आज भी देश में बड़ी संख्या में गुरुकुल संचालित हो रहे हैं। ज्ञान की हमारी परंपरा को घर से समाज तक ले जाने की व्यवस्था की रक्षा हमारे पुरुषों ने की है। उन्होंने कहा कि पश्चिम की शिक्षा के प्रभाव में हमारे परिवार की स्थिति ऐसी हो गई कि माताएं अपने बच्चों को बाल्यकाल से ही मातृभाषा से दूर करने लगती हैं। उन्हें अंग्रेजी की कविताएं याद करती हैं, जिनमें भारतीय जीवन मूल्य नहीं होते हैं।

सहज ढंग से लिखे जाएं ग्रंथ : सोहनी

क्षेत्र संघचालक अशोक सोहनी ने कहा कि लोगों को सहज समझ में आए, इस प्रकार से ग्रंथों की रचना की जाती है तो वे प्रभावी होते हैं। ग्रंथों को समझना और उनके आधार पर जीवन मूल्यों का निर्माण करना, उसके बाद उन्हें आत्मसात करना, यह ग्रंथों की सार्थकता है। उन्होंने कहा कि हमारा दर्शन कृति रूप में आना चाहिए।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उदाहरण देते हुए बताया कि संघ में कार्य करनेवाले तो जानते हैं कि संघ क्या है और क्या करता है। लेकिन आम लोगों को इसकी जानकारी कैसे हो, इसके लिए संघ का विचार ‘कृतिरूप संघदर्शन’ के रूप में प्रकाशित किया गया था। इस ग्रंथ के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में एक समझ बनती है। उन्होंने कहा कि प्रत्यक्ष दर्शन से भी शिक्षा मिलती है। हमारे गुरुकुल में आचार्यों का जीवन देखकर शिष्य बहुत सी बातों को सीख लेते थे। इसलिए हमारे यहां कहा गया है कि मनसा, वाचा, कर्मणा हमारा व्यवहार एक जैसा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य तभी उपयोगी है जब वह पढ़ा जाए और उसमें उल्लेखित जीवन मूल्यों का प्रकटीकरण समाज में दिखाई दे।

पुनरुत्थान विद्यापीठ ने स्वीकार की संदर्भ ग्रंथों के निर्माण की चुनौती: प्रो. कान्हेरे

विद्या भारती के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष प्रो. रविन्द्र कान्हेरे ने कहा कि जब हमने पश्चिम की शिक्षा प्रणाली अपनाई तो शिक्षा का हमारा मूल उद्देश्य तिरोहित हो गया। मातृभाषा की जगह विदेशी भाषा ने ली, जिसके कारण भाषा का संस्कार समाप्त हो गया। पश्चिम की शिक्षा प्रणाली ने भारत की ज्ञान परंपरा को नकार दिया गया। हमारे सामने यह स्थापित किया गया कि भारत की ज्ञान परंपरा में कुछ भी अच्छा नहीं है, जो कुछ ज्ञान श्रेष्ठ है, वह पश्चिम में ही है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 ने भारतीय शिक्षा के मूल आग्रह को समाहित किया है। यह नीति भारत के पुनर्जागरण का ड्राफ्ट है। आने वाले समय में इसका प्रभाव दिखाई देगा। भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम में कैसे शामिल किया जाए, यह एक बड़ा प्रश्न है। क्योंकि इसके लिए संदर्भ ग्रंथों की आवश्यकता है। पुनरुत्थान विद्यापीठ ने इस चुनौती को स्वीकार करके ग्रंथों की रचना कराई है। विद्यापीठ के संदर्भ ग्रंथों में अध्यात्म, स्वास्थ्य, आर्थिक, राजनीति, संचार, विज्ञान, समाज विज्ञान एवं भाषा विज्ञान सहित प्रमुख विषयों पर ग्रंथों का लेखन एवं पुराने ग्रंथों का पुनर्प्रकाशन कराया है।

कार्यक्रम में ज्ञान सागर प्रकल्प की जानकारी विद्यापीठ के संयोजक विपुल रावल ने दी। आभार व्यक्त कार्यक्रम की संयोजक नियति सप्रे के किया और कार्यक्रम का संचालन विजय चार्वे ने किया। इस अवसर पर नगर के गणमान्य नागरिक और शिक्षाविद भी उपस्थित रहे।

ज्ञान सागर में भोपाल के लेखकों के भी ग्रंथ शामिल हैं

पुनरुत्थान विद्यापीठ के ज्ञान सागर प्रकल्प के अंतर्गत प्रकाशित 1051 ग्रंथों में भोपाल के लेखक लोकेंद्र सिंह की पुस्तक ‘डॉ. भीमराव अंबेडकर- पत्रकारिता एवं विचार’ और रंजना चितले की पुस्तकें सिपाही बहादुर, टंट्या भील, झलकारी बाई और भीमा नायक भी शामिल हैं। राजेंद्र परमार की ज्ञानार्जन के करणों का विकास, भागीरथ कुमरावत, रामेश्वर पंकज मिश्र, प्रो. कुसुमलता केडिया, डॉ. कपिल तिवारी और रघुवीर गोस्वामी सहित अन्य लेखकों की पुस्तकें भी शामिल हैं।

विद्वत गोष्ठी का आयोजन

लोकार्पण कार्यक्रम के बाद तीन सत्रों में ‘पश्चिमीकरण से भारतीय शिक्षा की मुक्ति’ विषय पर विद्वत गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें विभिन्न शिक्षक संस्थानों के शिक्षक सहभागी हुए। इस विद्वत गोष्ठी में तीन उप–विषयों– स्वायत्त शिक्षा, अर्थ निरपेक्ष शिक्षा और भारतीय ज्ञान धारा की शिक्षा, पर विद्वानों ने विचार मंथन किया। इस अवसर पर विद्यापीठ की कुलपति इंदुमती काटदरे ने कहा कि यह विचार करने की आवश्यकता है कि यह समाज और राष्ट्र कैसे चलेगा? यह जिम्मेदारी भारतीय समाज की है, सरकार की नहीं। भारत की शिक्षा व्यवस्था कैसी हो, यह भारतीय समाज को विचार करना चाहिए। 18वीं शताब्दी तक भारत में शिक्षा व्यवस्था शासन आधारित नहीं थी। गुरुकुल और विश्वविद्यालय समाज पोषित थे। हमें अपनी शिक्षा को स्वायत्त, अर्थ निरपेक्ष और भारतीय ज्ञान धारा के अनुरूप विकसित करना है। भारत का ज्ञान विश्व को भी अनेक संकटों से मुक्ति दिला सकता है।

(Udaipur Kiran)

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